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  • tanu190593

भूले नहीं, मां एक औरत भी है।


एक औरत मकान को घर बना देती है। इसी घर बना देने की आशा में बहुत महिलाएं अपने को भूल जाती है। मैंने अपनी मां को देखा है, कैसे वो निस्वार्थ सबका खयाल रखती है उनको सबके लिए करते देखा है। उनको सबके खाने से लेकर हर चीज का ध्यान होता है। इस घर वाली पद्धति को ना जाने कब से बहुत महिलाएं मेरी मां जैसी ढो रही है। शायद अब ये उनकी ज़िंदगी का हिस्सा है। मैंने एक दिन मां से पूछा आप क्यूं करती हो सबके लिए? तब मां ने जवाब में बोला जब मां बनोगी तब समझ आएगा। उस वक़्त मन में आया कि मां को समझाऊं की यह मां शब्द की महिमामंडन का नतीजा है। मां यानी जो सबके लिए जीना जानती है। हम लोगो ने मां को असाधारण बना दिया है। जिम्मेदारियों की गठरी मा के कंधो पे दे डाली है। कुछ लोग बोलते है यह नेचुरल स्वभाव होता है।

क्या है ऐसा?

समाज में मा को स्नेह भरी मूरत, त्याग की देवी, और ना जाने क्या क्या समझा जाता है। जिसके कारण महिलाओ पर एक अलग किस्म का अदृश्य दबाव बन जाता है। ये दबाव काफी सदियों से घोल कर पिलाया गया है। जिसकी जड़ें इतनी पक्की है कि अमूनन लोग मां को भगवान बना देते है। पता नहीं क्यूं लोग भूल जाते है मां की भी इच्छाएं होती है।


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