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  • tanu190593

कृपया प्रेम को प्रेम ही समझे, परिभाषित ना करे…..




प्यार…. आखिर है क्या?

प्यार को शब्द में पीरोना मुश्किल होगा। यह एहसास है, जो हर व्यक्ति के पास है। प्रेम भावना है, साधना है, ना जाने क्या क्या है। प्यार के कई सारे पैमाने है, मा- बाप का प्यार, भाई - बहन का प्यार, दोस्ती वाला प्यार, और प्रेमी का प्यार। पूरी दुनिया की सुई, ' प्रेमी के प्यार ' पे अटक जाती है। ये अटकना, आम नहीं है, क्यूं की इस प्रेम को परिभाषित किया गया है। बड़ी ही संकुचित परिभाषा में, यानी एक मर्द और औरत का प्यार। अगर किसी और किस्म का प्यार पाया गाया, तो आपकी खैर नहीं।


नारीवाद इसलिए बुरा है , समाज के लिए, क्यूंकि परिभाषित ' प्रेमी के प्रेम ' को नकारता है। आप ही सोचिए, कोई क्यूं लोहा लेगा दुनिया से,समलैंगिक प्रेम करके?


सोचिए, सोचिए…..

यह भी सोचना होगा, क्यों ज्यादातर लोग नॉर्मल नहीं ले पाते?

दोष लोगो का भी नहीं दे सकते है। क्यूं की चली आ रही मानसिकता ही ऐसी है की यह एक बीमारी है। प्याज में जैसे बहुत सारी परते होती है, वैसे ही मानसिकता की उपज भी उन परतो की तरह है। विस्तार से बात करूंगी की, मानसिकता बनती कैसे है?


१. परिवेश

२. प्रेमी का प्रेम , सिर्फ दो लिंग(एक पुरुष और महिला) ही कर सकते है।

३. तमाम एडवरटाइजमेंट, गाने, और फिल्में जो एक पक्ष के प्यार को सालो से दिखा रहे।

४. परिवार की परिभाषा सिर्फ,' मा - बाप और बच्चा ' है। शायद से इसमें तमाम प्रेम करने वाले फिट ना हो।


इसके कारण ज्यादातर लोग इस प्रकार के प्रेम को प्राकृतिक(natural , normal) मानते आ रहे है। बड़े करीब से देखा है, तब मे मै स्कूल में थीं। मेरा मित्र हुआ करता था और अभी भी है। बचपन से ही उसको मेंहदी लगाने और लगवाने, और कई ऐसे कामों का शौक था। जो शायद सामाजिक रूप से लड़कियों के काम माने जाते है। वो अकेला लड़का होता था, मेंहदी कॉम्पटीशन में, जो बड़े ही गर्व की बात है। पर तब स्कूल में सब उसका मज़ाक बनाते रहते थे। कभी आधी लड़की, मामला ढीला है इसका, ना जाने क्या क्या बोलते थे। तो उसकी मानसिक स्थिति का अनुमान भी नहीं लगा सकती। बड़े ही कठिन परिस्थितियों से गुजरा है। मानो कितनी बार उसने, प्रेम की परिभाषा में फिट होने की नाकाम कोशिश की होगी, पर फिट ना हो पाया होगा। ऐसे तमाम लोग है, जो इसी जदो- जहद से गुजर रहे है, की हम कौन सा प्रेम कर रहे है?, क्या हम नॉर्मल है? कहीं हम गंदे तो नहीं है? , कैसे ठीक करे खुद को ? , कैसे समाज के जजमेंट से बचे?, क्या हम परिवार बना सकते है अपना? इत्यादि।


प्रेम किसी बंधन का मोहताज नहीं है पर क्या वाकई ऐसा है? लोगो को छीप कर प्यार करना पड़ रहा है। सामाजिक ढांचा ही ऐसा है , की प्रेम भी सोच समझ कर करना पड़ता है। लड़का लड़की से प्रेम करे, एक जात का प्रेम हो पर एक गोत्र का नहीं, हिन्दू हिन्दू से, मुस्लिम मुस्लिम से और ना जाने क्या क्या।

अलबत्ता प्यार भी करने की आज़ादी नहीं? अगर नारीवाद हमें इन परिभाषाओं को भूलने को कह रहा। तो क्या गलत है? अगर सुबह का भुला शाम को घर लौट आए, तो यह सबसे अच्छी बात है। क्यूंकि समाज में कुछ लोगो को हम चाहे और अनचाहे रूप से यातना दे रहे है।

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